सामुदायिक सहयोग हेतु कार्य-योजना निर्माण कैसे करें?

विद्यालय प्रबंध समिति (SMC) के सदस्य विद्यालय और समुदाय के बीच प्रमुख सेतु हं भूमिका निभा सकते हैं।

इसके लिए व्यक्तिगत स्तर पर प्रत्येक विद्यालय को एस०एम०सी0 सहयोग से सामुदायिक सहयोग की कार्य योजना विकसित करनी होगी। कार्य योजना के संभावित क्षेत्र निम्नवत हो सकते हैं।


(अ) भौतिक संसाधन-चहारदिवारी, पंखा, फर्नीचर, स्टेशनरी, पेयजल, स्मार्ट बोर्ड, शैक्षिक तकनीकी से संबंधित उपकरण आदि।


(ब) मानवीय संसाधन-सामुदायिक संसाधनों का कक्षा-कक्षीय एवं अन्य सहशैक्षिक क्रियाकलाप में उपयोग।

 उक्त बिन्दुओं के परिप्रेक्ष्य में हमें अपनी संस्था उपलब्ध भौतिक / मानवीय संसाधनों की उपलब्धता की समीक्षा करने के बाद विद्यालय की आवश्यकताओं का चिह्नांकन करना होगा तदुपरान्त उन आवश्यकताओं का वर्गीकरण करते हुए सामुदायिक सहभागिता के प्रकार को स्पष्ट रूप से रेखांकित करते हुए समुदाय से संपर्क स्थापित करना होगा।

 इस प्रकार आवश्यकताओं के अनुसार संदर्भों/ स्रोतों की मदद लेते हुए कार्य योजना विकसित कर हम अपने कार्य को और बेहतर बना सकते हैं तथा समुदाय से बेहतर जुड़ाव स्थापित कर सकते हैं ।


            सामुदायिक सहयोग की कार्य योजना


इस कार्य योजना का सुनियोजित क्रियान्वयन न केवल आपके विद्यालय को आदर्श बनाने में मदद करेगा बल्कि आपको अपने कार्य क्षेत्र में लोकप्रिय भी बनाएगा।


सामुदायिक सहभागिता की गतिविधियाँ


अध्यापकों द्वारा अभिभावकों से बैठक में प्रतिभाग करने हेतु व्यक्तिगत तौर पर संपर्क किया जाय।


समस्त अध्यापकों द्वारा विद्यालय प्रबन्धन समिति की मासिक बैठक में प्रतिभाग किया जाय । लेखपाल, ए.एन.एम. और ग्राम पंचायत के प्रतिनिधि से संपर्क कर एस०एम०सी0 की बैठक में प्रतिभाग करने हेतु अनुरोध किया जाय।


बैठक में छात्र-छात्राओं की उपस्थिति पर चर्चा की जाय। यदि छात्र छात्राओं की उपस्थिति 60 प्रतिशत से कम है तो अभिभावकों के साथ विचार-विमर्श किया जाय कि बच्चों की उपस्थिति को कैसे बढ़ाया जाय।


एस.एम.सी. की मासिक बैठक में विद्यालय न आने वाले बच्चों का विवरण तैयार कर उनके परिवारों से सम्पर्क करके यथा सम्भव सहायता प्रदान कर उन्हें अपने बच्चों को विद्यालय भेजने के लिए प्रेरित किया जाये।


. बैठक में अभिभावकों के साथ निःशुल्क पाठ्य-पुस्तकों, यूनिफॉर्म, जूता-मोजा, स्कूल बैग एवं स्वेटर वितरण पर चर्चा एवं छात्र छात्राओं को प्रत्येक दिन यूनिफॉर्म में आने के लिये प्रेरित किया जाये।


एम.डी.एम. योजना के अन्तर्गत मीनू के अनुसार नियमित रूप से भोजन वितरण एवं व्यवस्था में सहयोग लिया जाय।


- विद्यालय भवन के रख-रखाव एवम् साफ सफाई की व्यवस्था पर चर्चा की जाए।


- स्थानीय स्तर पर उपलब्ध कारीगरों, संगीत, कहानी सुनाने में निपुण अभिभावकों को विद्यालय में आमंत्रित कर बच्चों को जानकारी दी जाए।


- एस०एम०सी० की बैठक में लिये गये निर्णयों व कार्यवृत्ति के अभिलेखीकरण को एस०एम०सी0 बैठक रजिस्टर में दर्ज करते हुए प्रेरणा ऐप (PRERNA App) पर अपलोड किया जाए।

 विद्यालय प्रबन्धन समिति (एस0एम0सी0) के सदस्यों द्वारा बैठकों में लिये गये उनके निर्णयों को समुदाय में सार्वजनिक किया जाय जिससे समुदाय के लोग भी विद्यालय के प्रति संवेदनशील व अपने सभी बच्चों के शत-प्रतिशत नामांकन, उपस्थिति, ठहराव एवं गुणवत्तायुक्त शिक्षा में एक जिम्मेदार नागरिक होने के नाते सहयोग प्रदान करें।


- एस0एम0सी0 के कार्यों एवं उनके उत्तरदायित्वों के बोध एवं सभी समुदाय के लोगों को जागरूक करने के लिए जनपहल रेडियो कार्यक्रम की शुरुआत की गयी है।

 यह कार्यक्रम समुदाय को इस बात के लिए प्रेरित करता है कि एस०एम०सी0 के सदस्य एवं अभिभावक कैसे अपने कार्यों और उत्तरदायित्वों का निर्वहन करेंगे।

प्रत्येक एस0एम0सी0 के सदस्य को "जन पहल हस्त पुस्तिका उपलब्ध करायी गया है, जिसमें बाल अधिकार, शिक्षा का अधिकार अधिनियम, विद्यालय प्रबन्धन समिति की संरचना एवं गठन, विद्यालय विकास योजना, विद्यालय प्रबन्ध समिति एवं स्थानीय प्राधिकारी के सदस्यों के कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों, को स्पष्ट किया गया है।

 इसमें बच्चों की शिक्षा एवं विद्यालय के संचालन एवं प्रबंधन में विद्यालय प्रबन्ध समितियों द्वारा मासिक बैठक, एस०एम०सी0 बैठक रजिस्टर, दिव्यांग बच्चे, हाउस होल्ड सर्वे, विशेष प्रशिक्षण, गुणवत्ता शिक्षा एवं बालिका शिक्षा के अन्तर्गत किये जा रहे कार्यक्रमों, यथा कायाकल्प /स्वच्छ भारत अभियान, जन पहल रेडियो कार्यक्रम, मध्याहन भोजन योजना एवं स्कूल में बच्चों की सुरक्षा हेतु गाईडलाइन की जानकारी, के साथ सामान्य अभिलेखों, वित्तीय अभिलेखों का रखरखाव, एस0एम0सी0 का ग्राम शिक्षा समिति/ स्थानीय प्राधिकारी एवं अन्य विभागों से समन्वय के बारे में जानकारी दी गयी है।


शिक्षण के तरीके और गतिविधियाँ

परिवेश, पर-परिवार, कक्षा-कक्षा में उपलब्ध विभिन्न आकृति की वस्तुओं पर बातचीत करने छूकर पता करने, उलटने--पलटने एवं विविध रूपों में जमाने के अनुभव का भीका देने से बच्चों में ज्यामितीय आकृति सम्बन्धी अवधारणात्मक समझ का विकास होता है। यह समझ निम्नांकित रूपों में हो सकती है-


एक ही आकृति के कई रूप हो सकते हैं।


एक ही आकृति में एक से अधिक रूप समाहित होते हैं। एक आकृति के अलग-अलग संयोजन से नयी आकृतियाँ बनती हैं।


अलग-अलग प्रकार की आकृतियों को समझने के लिए एक ही प्रकार के तरीके कारगर नहीं होते अर्थात प्रत्येक प्रकार की आकृति को एक ही प्रकार से नहीं समझा जा सकता।


इस प्रक्रिया के दौरान बच्चे यह भी समझने व अनुभव करने में समर्थ हो जाते हैं कि गेंद और गोले का चित्र उसे पूरी तरह से व्यक्त नहीं कर पाता है।

 यह वृत्ताकार क्षेत्र से किस प्रकार भिन्म है? इन आकृतियों की समझ उन्हें आगे चलकर परिमाप, क्षेत्रफल एवं आयतन तक किस प्रकार ले जाती है? इनके अवधारणात्मक समझ के विकास के लिए शुरुआती कक्षाओं में आगे दिए गए सुझाव और गतिविधियों का शिक्षण में प्रयोग बच्चों के सीखने में सार्थक प्रभाव लाएगा।


गतिविधि-1, अपर देख, नीचे देख, बायें देख, दायें देख


बच्चों को गोल घेरे में खड़ा करें। आप बीच में खडे होकर गतिविधि का संचालन करें। बच्चे ऊपर देख, नीचे देख, बायें देख, दायें देख दोहराते हुए गोल घेरे में घूमेंगे।

 आप उनसे ऐसे सवाल पूछते रहें- क्या है गोल, क्या है गोल? क्या है चौकोर, क्या है चौकोर? क्या है तिकोना, क्या है तिकोना? बच्चे आपके सवाल के आधार पर कक्ष या आसपास मौजूद धीजों के नाम बतायेंगे।

 गतिविधि कराने के बाद बच्चों से गतिविधि के दौरान बोले गए नामों की श्रेणीवार सूची बनवाए।



गतिविधि-2


बच्चों के दो समूह बनायें। बच्चे कक्षा-कक्ष में उपस्थित चीजों के आकार के बारे में प्रश्नोत्तर करेंगे। एक समूह प्रश्न करे तथा दूसरा समूह पूछे गये प्रश्नों का उत्तर देगा। यही कार्य समूह की भूमिकाीत बदस कार कराएं। हर सवाल के जवाब में जो समूह सही और ज्यादा चीजों के बताएगा, वह जीतेगा।


कौन-कौन चीजें गोल है?


क्या-क्या चौकोर है? बेलनाकार वस्तुएं कौन सी है?


क्या कक्षा में कोई वस्तु शंक्वाकार है?


गतिविधि को विस्तार देते हुए बाह्य परिवेश की वस्तुओं की आकृतियों के बारे में घर की वस्तुओं की बनावट के बारे में प्रश्नोत्तर कराएं।


गतिविधि-3


घर, परिवार, पास-पड़ोस में पायी जाने वाली विभिन्न आकृति वाली वस्तुओं के आकार-प्रकार के बारे में बातचीत करें। रसोई एवं कक्षा में पायी जाने वाली विभिन्न वस्तुओं के आकार प्रकार पर चर्चा करें।


गतिविधि-4


विभिन्न आकृति वाली वस्तुओं को कक्षा में रखें अब समान आकृति वाली वस्तुओं को बच्चों से अलग करवायें।

 वस्तुओं के नाम पूछे। हर एक की बनावट के बारे में चर्या करें। विभिन्न वस्तुओं की आकृतियों की पहचान के बाद एक-दूसरे से भिन्नता के कारणों पर बातचीत करें।


गतिविधि-5


वक्रतल एवं समतल का अनुभव कराने के लिए ऐसे तलों वाली वस्तुएँ- (गेंद, बेलन, शंक, घन, घनाभ) बच्चों को दें।

 वस्तुओं के तलों पर बच्चों को हाथ फिराने को कहें. फिर उनसे उस पर बातचीत करें।


• कितने तल और किस-किस प्रकार के हैं?

 किनारे कितने है?


कागज से घन, घनाभ बनाये घन और घनाभ बच्चों को देकर अवलोकन करायें। फिर कोर, तल, कोने को गिनवाकर स्पष्ट करें। धन और घनाभ के तलों पर 1 से 6 तक की संख्याएँ लिखवाकर तलों की संख्या स्पष्ट करायें।


गणित किट में उपलब्ध वस्तुओं (घन, घनाभ, गोला, बेलन, शंकु) से तलों की पहचान लुढ़काकर खिसकाकर करायें, फिर तलों को स्पष्ट करें।



गतिविधि-6


बच्चों से सूची बनवायें


कौन-कौन खिलौने शंक्वाकार है?


गोलाकार, बेलनाकर एवं शंक्वाकार सब्जियाँ कौन-कौन सी हैं?


कौन-कौन से फल समान आकृति के है?


मिठाइयों का नाम उनकी आकृतियों के नाम के साथ लिखवायें।


घर में कौन-कौन से बर्तन बेलनाकार है?


कक्षा में कौन-कौन सी चीजें आयताकार दिख रही हैं?


गतिविधि -7


बच्चों को छोटे समूह में बाँटकर सीकों या माचिस की तीलियों का उपयोग करते हुए नभुजाकार, आयताकार, वर्गाकार आकृतियाँ बनवाएँ और हर समूह द्वारा बनाई गई आकृति के बारे बातचीत करें।

अलग-अलग आकृति बनाने में लगी तीलियों/सीकों की संख्या गिनवाकर पता करायें ।


अलग-अलग आकृति में लगी तीलियों की तुलना करायें। आयताकार एवं तकर आकृति में समानता और अन्तर पता करायें।


- पाक आकृति में लगी तीलियों / सीकों की लम्बाई में एक साथ रखवाकर कुल लम्बाई पता कराय। फिर बतायें-यही परिमाप है।


पटरी की सहायता से अलग-अलग भुजा नपवायें। फिर तुलना कराकर योग करवायें


विद्यालयों में सहशैक्षिक गतिविधियों को कैसे क्रियान्वित करें?

प्रारम्भिक विद्यालयों में सह शैक्षिक गतिविधियों के आयोजन में


प्रधानाध्यापक एवं अध्यापक की भूमिका को निम्नवत् देखा जा सकता है।

 • विद्यालयों में सहशैक्षिक गतिविधियों को कैसे क्रियान्वित करें, इसके बारे में परस्पर चर्चा करना तथा आवश्यक सहयोग प्रदान करते हुए निरंतर संवाद बनाये रखना।

क्रियाकलापों का अनुश्रवण करना तथा आयी हुई समस्याओं का निराकरण सभी की सहभागिता द्वारा करना। इन क्रियाकलापों में बालिकाओं की सहभागिता अधिक से अधिक हो साथ ही साथ सभी छात्रों की प्रतिभागिता सुनिश्चित हो, इस हेतु सामूहिक जिम्मेदारी लेना।।

• समय सारिणी में खेलकूद/ पीटी,ड्राइंग, क्राफ्ट, संगीत, सिलाई/बुनाई व विज्ञान के कार्यों प्रतियोगिताएं हेतु स्थान व वादन को सुनिश्चित करना। 

• स्कूलों में माहवार/त्रैमासिक कितनी बार किस प्रकार की प्रतियोगिताएं कराई गई, इसकी जानकारी प्राप्त करना एवं रिकार्ड करना। बच्चों के स्तर एवं रुचि के अनुसार कहानियां, चुटकुले, कविता आदि का संकलन स्वयं करना तथा बच्चों से कराना।

 • विज्ञान/गणित सम्बन्धी प्रतियोगिताओं हेतु विषय से सम्बन्धित प्रश्न बैंक रखना।

आवश्यक वस्तुओं का संग्रह रखना।

जन सहभागिता एवं सहयोग हेतु जनसंपर्क मेले, बाल मेले, प्रदर्शनी का आयोजन, शिक्षाप्रद फिल्मों को दिखाने की व्यवस्था करना।

 विद्यालय स्तर पर विभिन्न प्रकार की कार्यशाला, सेमीनार, गोष्ठियों एवं प्रतियोगिताओं का आयोजन शिक्षकों एवं बच्चों दोनों ही स्तरों के लिए किया जाना।


खेल गतिविधियां एवं प्रतियोगिताएं

बच्चों के बहुमुखी विकास और विद्यालय से लगाव के लिए खेल गतिविधियों एवं प्रतियोगिताओं आयोजन आवश्यक है। इनसे जहाँ एक और उनका शारीरिक- मानसिक विकास होता है वहीं धुरती फुर्ती भी बनी रहती है।

 कुछ बच्चे जिनका रूझान खेल के प्रति अधिक होता है वे खेलों सहारे जीवन में बहुत आगे तक बढ़ जाते है।

खेल गतिविधियों में शामिल है- योग, व्यायाम पी. टी. आत्मरक्षा के तरीकों (जूड़ो/ताईक्वान्डो) साथ इनडोर-आउटडोर खेल।

 हमारे विद्यालयों में खेल के लिये पीरियड भी निर्धारित हैं प्रार्थना गत और अतिरिक्त समय पर भी इन गतिविधियों के लिये अवसर हैं । 

हमारे विद्यालयों के बच्चे भन्न स्तर की खेल प्रतियोगतिाओं में भी भाग लेते है। निःशुल्क एवं अनिवार्य बाल शिक्षा अधिकार नियम के अनुसार हर विद्यालय में खेल सामग्री होना अनिवार्य किया गया है फलस्वरूप आजकल सभी विद्यालयों में खेल सामग्री उपलब्ध है।

 अत: बच्चों के शारीरिक एवं मानसिक विकास हेतु में नियमित रूप से विद्यालय में खेल गतिविधियों का आयोजन करना चाहिए।

सम्भावित समय सारणी



                                                           

                               सामिग्री



सोचें!


 आपके विद्यालय में कौन-कौन से उपकरण/सामग्री उपलब्ध है? इनको लगातार उपयोग और समृद्ध करने की क्या योजना है? 


क्या आपके विद्यालय में बच्चों के लिए खेल प्रतियोगिताएँ होती हैं? यदि हाँ, तो कौन-कौन सी? यदि नहीं, तो हो पाएं, इसकी क्या कार्य योजना है?

 क्या आपके विद्यालय के सभी शिक्षक/ बच्चे/एस. एम. सी. के सदस्य तथा अभिभावक इस व्यवस्था में शामिल हैं?




समुदाय को विद्यालय से कैसे जोड़ें?

यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण मुद्दा है जिससे हमारे बहुत से विद्यालयों को जूझना पड़ता है।

 लगातार सरकारी/विभागीय निर्देशों और एस०एम०सी0 के गठन के बावजूद हममें से अधिकांश शिक्षक अभी भी अपने विद्यालयों से समुदाय को अपेक्षानुरूप नहीं जोड़ पा रहे हैं।

इस मुद्दे की पड़ताल पर जाने से पूर्व सबसे पहले हम यह विचार करें कि हमने पिछले छह महीने में कब-कब और किस उद्देश्य से समुदाय के लोगों को स्कूल में बुलाया था या उनसे मुलाकात की थी।

हम पाएँगे कि यह मुलाकातें या निमंत्रण बहुत सीमित मात्रा में तथा औपचारिक ही ज्यादा थे।

 समुदाय के व्यक्तित्व किन्हीं राष्ट्रीय पर्वों या सभाओं में विद्यालय आए भी तो उनकी भूमिका कार्यक्रम में मूक दर्शक की तरह बैठे रहना भर ही रही। 

स्वाभाविक है कि खाली बैठे रहने (निरुददेश्य) की भूमिका में स्वयं को पाकर समुदाय का व्यक्ति हमारे पास आखिर क्यों और कब तक आता जाता रहेगा ?

आज हम सभी का जीवन विभिन्न प्रकार की व्यस्तताओं से भरा है और समुदाय के हर व्यक्ति । 

सबकी कमोबेश यही स्थिति है। समय नहीं मिल पाया आज के दौर का ऐसा वाक्य है कि जिसे हर तीसरा व्यक्ति कहता मिल जाता है। स्वाभाविक भी है कि आजकल के व्यस्त समय में किसी भी .... व्यक्ति को निरुद्देश्य कहीं भी आना जाना या बुलाया जाना सहज नहीं रहा है। 

व्यक्तिगत सत्ता के चलते महीनों हमारा और समुदाय का एक-दूसरे से संवाद स्थापित नहीं हो पाता। इस प्रकार की निरंतर संवादहीनता की स्थिति के चलते समुदाय हमसे और विद्यालय से कटता चला जाता है।

तब क्या हो कि समुदाय हमसे जुड़े? इसके लिये सबसे पहली और जरूरी बात होगी समुदाय कि सदस्यों की विद्यालयीय क्रियाकलापों में नियमित और रचनात्मक उपस्थिति । 

यह उपस्थिति निरुदेदशीय न होकर सोद्देश्य पूर्ण होगी जिसमें आमंत्रित सदस्यों की विद्यालयीय गतिविधियों में रिचनात्मक सहभागिता सुनिश्चित की जाएगी जैसे-

प्रार्थना सत्र में, कक्षा शिक्षण में, राष्ट्रीय पर्वो पर, बाल मेलों में, प्रदर्शनी, प्रतियोगिताओं में, जयन्तियों में, स्थानीय त्योहारों में, शैक्षिक भ्रमण में, सह शैक्षिक गतिविधियों में आई.सी.टी. के उपयोग में शिल्प कला, खेल, शारीरिक शिक्षा से संबंधित क्रियाकलापों में, संगीत, गायन, वादन, नूत्य के क्रियाकलापों में, स्थानीय पाठ्यक्रम निर्माण में, स्थानीय लोकगीत. लोक नृत्य, लोक कलाओं के संग्रह, संकलन, प्रदर्शन से जुड़े क्रियाकलापों में, स्थानीय उपचार (चिकित्सा पद्धति), इतिहास, भूगोल की जानकारी के क्षेत्रों में, स्थानीय साहित्य की जानकारी में, स्थानीय लाइब्रेरी, स्थानीय संग्रहालय विकसित करने में, स्थानीय खेल का मैदान विकसित करने में विद्यालयों के स्वरूप को संवारने में उक्त बिन्दुओं के परिप्रेक्ष्य में हमें अपनी संस्था उपलब्ध भौतिक / मानवीय संसाधनों की उपलब्धता की समीक्षा करने के बाद विद्यालय की आवश्यकताओं का चिह्नांकन करना होगा तदुपरान्त उन आवश्यकताओं का वर्गीकरण करते हुए सामुदायिक सहभागिता के प्रकार को स्पष रूप से रेखांकित करते हुए समुदाय से संपर्क स्थापित करना होगा इस प्रकार आवश्यकताओं अनुसार संदर्भों/ स्रोतों की मदद लेते हुए कार्य योजना विकसित कर हम अपने कार्य को और बेहत बना सकते हैं तथा समुदाय से बेहतर जुड़ाव स्थापित कर सकते हैं।

                    सामुदायिक सहयोग की कार्य योजना

 


इस कार्य योजना का सुनियोजित क्रियान्वयन न केवल आपके विद्यालय को आदर्श बनाने मदद करेगा बल्कि आपको संबंधित क्षेत्र में लोकप्रिय भी बनाएगा।







बाल संसद : उद्देश्य, शिक्षक की भूमिका, बाल संसद गठन, एवं समितियों के प्रमुख कार्य


 बाल संसद क्या है? 

बालक- बालिकाओं का एक मंच जिसका प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक विद्यालयों में गठन किया जाता है।

 बाल संसद के उद्देश्य : 

जीवन मूल्यों का विकास व्यक्तित्व विकास, नेतृत्व क्षमता, निर्णय लेने का क्षमता, सही/गलत स्पर्श की समझ, समय प्रबन्ध इत्यादि पर स्पष्ट समझ।

शिक्षक की भूमिका: 

बाल संसद के संयोजक के रूप में सहयोग करना।

              मंत्रिमण्डल/स्वरूप /गठन समितियां: 

1. प्रधानमंत्री 

                           1 व 2 में एक छात्रा का चयन अवश्य हो।

2 उप-प्रधानमंत्री


3. शिक्षा मंत्री

                            सह मीना मंच मंत्री (अनिवार्य रूप से छात्रा है)

4. उपशिक्षा मंत्री


5, स्वास्थ्य एवं स्वच्छता मंत्री 6. उप स्वास्थ्य एवं स्वच्छता मंत्री


7. जल एवं कृषि मंत्री


8. उप जल एवं कृषि मंत्री


9. पुस्तकालय एवं विज्ञान मंत्री 


10. उप पुस्तकालय एवं विज्ञान मंत्री


11. साँस्कृतिक एवं खेल मंत्री


12 उप साँस्कृतिक एवं खेल मंत्री


                            समितियों के प्रमुख कार्य


मंत्रिमण्डल                                               कार्य

प्रधानमंत्री                          विशेष अवसरों पर विद्यालय में समारोह                                              आयोजित करना एवं महत्वपूर्ण निर्णय लेना


शिक्षा मंत्री                           सभी बच्चों को पढ़ने के लिए प्रेरित करना।


स्वास्थ्य एवं स्वच्छता मंत्री      व्यक्तिगत स्वच्छता, परिसर शौचालय की                                              सफाई पर ध्यान देना।


जल एवं कृषि मंत्री               विद्यालय में पेड़-पौधे, क्यारिया, परिसर के 

                                         सौन्दयीकरण पर ध्यान देना, पीने के पानी                                           की स्वच्छता का ध्यान रखना।


पुस्तकालय एवं विज्ञान मंत्री    पुस्तकालय की किताबें पढ़ने की आदत                                              डलवाना, वैज्ञानिक दृष्टिकोण नवाचारों में                                            सहयोग करना।


सांस्कृतिक मंत्री                     सास्कृतिक गोष्ठी, वार्षिक खेलकुद,                                                     राष्ट्रीय पर्वों पर समारोह आयोजन।


नोट- सभी विद्यालयों में बाल संसद का गठन करना अनिवार्य है।





विद्यालयी शिक्षा में नयी पहलें, अधिगम के उद्देश्य एवम विद्यालयी शिक्षा के लिए समेकित योजना

शिक्षा, मानव संसाधन विकास का मूल है जो देश की सामाजिक-आर्थिक बनावट को संतुलित करने में महत्वपूर्ण और सहायक भूमिका निभाती है बेहतर गुणवत्ता का जीवन प्राप्त करने के लिए एवं अच्छा नागरिक बनने के लिए बच्चों का चहुँमुखी विकास जरूरी है।


 शिक्षा की एक मजबूत नींव के निर्माण से इसे प्राप्त किया जा सकता है। इस मिशन के अनुसरण में, मानव संसाधन विकास मंत्रालय (एम.एच.आर.डी.) दो विभागों के माध्यम से काम करता है

 स्कूली शिक्षा और साक्षरता 

 उच्च शिक्षा विभाग

 जहाँ विद्यालय शिक्षा और साक्षरता विभाग देश में स्कूली शिक्षा के विकास के लिए जिम्मेदार है, वहीं उच्च शिक्षा विभाग, संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन के बाद दुनिया की सबसे बड़ी उच्च शिक्षा व्यवस्था में से एक की देखभाल करता है।

 एम.एच.आर.डी. अपने संगठनों जैसे एन.सी.ई.आर.टी, एन.आई.ई.पी.ए. एन.आई.ओ.एस., एन.सी.टी.ई. आदि के साथ मिलकर काम कर रहा है। हालाँकि एम.एच.आर.डी. का दायरा बहुत व्यापक है, यह मॉड्यूल डी.ओ.एस.ई.एल. द्वारा सार्वभौमिक शिक्षा और इसकी गुणवत्ता में सुधार की दिशा में हाल में किए गए प्रयासों पर केंद्रित है।

अधिगम के उद्देश्य

इस मॉड्यूल के अध्ययन से शिक्षार्थी-

डी.ओ.एस.ई.एल. द्वारा स्कूली शिक्षा हेतु किए गए हाल के प्रयासों जैसे- पी. जी. आई., यू.डी.ई.एस.ई.+ आदि के बारे में जागरूकता प्राप्त कर स्कूल में क्रियान्वित कर पाएँगे।

विद्यालय शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के लिए 'समग्र शिक्षा के अंतर्गत उद्देश्यों और प्रावधानों को समझेंगे।

स्कूलों में सीखने-पढ़ने की आदतों को बढ़ावा देने के संदर्भ में पुस्तकालय की पुस्तकों के उपयोग और खेल, रसोईघर से जुड़ी बागवानी (किचन गार्डन; पोषण उद्यान), युवा और पारिस्थितिकी क्लब आदि प्रयासों के माध्यम से बच्चों को आनंदमय एवं अनुभवजन्य अधिगम के अवसर प्रदान करेंगे।

भूमिका

1976 से पहले तक शिक्षा राज्यों की विशेष जिम्मेदारी थी। 1976 का संवैधानिक संशोधन, जिससे शिक्षा समवर्ती सूची में शामिल हुई, एक महत्वपूर्ण दूरगामी कदम था।

 वित्तीय, प्रशासनिक और मूलभूत बदलावों के लिए केंद्र सरकार और राज्यों के बीच ज़िम्मेदारी के नए बंटवारे की आवश्यकता थी।

 हालांकि इससे शिक्षा में राज्यों की भूमिका और जिम्मेदारी काफी हद तक अपरिवर्तित रही है, पर इसके बावजूद केंद्र सरकार ने शिक्षा के राष्ट्रीय और एकीकृत चरित्र को मजबूत करने, सभी स्तरों पर शिक्षा के पेशे सहित अन्य समस्त आयामों में गुणवत्ता और मानक बनाए रखने और देश की शैक्षिक ज़रूरतों के अध्ययन और निगरानी की एक बड़ी ज़िम्मेदारी स्वीकार की। 

देश में प्राथमिक शिक्षा के सार्वभौमीकरण (यू.ई.ई.) की प्राप्ति के साथ-साथ माध्यमिक शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए भारत सरकार ने कई कार्यक्रमों और परियोजनाओं की शुरुआत की, जिन्हें आम तौर पर केंद्र प्रायोजित योजना (सी.एस.एस.) कहा जाता है। 

सी.एस.एस. वे योजनाएँ हैं जो राज्य/संघ राज्य क्षेत्रों (यू.टी.) की सरकारों द्वारा कार्यान्वित की जाती हैं, लेकिन इनका वित्तपोषण मुख्यतया केंद्र सरकार द्वारा किया जाता है, जिसमें राज्य सरकार की भागीदारी भी निर्धारित होती है। शिक्षा पर राष्ट्रीय नीतियों के सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए देश की मानव संसाधन क्षमता का पूरी तरह से उपयोग करने तथा समान गुणवत्ता की शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए सरकार, विभिन्न केंद्र प्रायोजित योजनाओं के कार्यान्वयन में एकीकृत दृष्टिकोण अपनाती है।

 इसके सर्वमान्य उद्देश्य हैं— गुणवत्तापूर्ण विद्यालय शिक्षा के साथ-साथ पहुँच बढ़ाना; वंचित समूहों और कमजोर वर्गों के समावेश के माध्यम से साम्यता को बढ़ावा देना; और शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करना।

 हाल ही में एम.एच.आर.डी. ने प्रदर्शन ग्रेड इंडेक्स (पी.जी.आई), यू.डी.आई.एस.ई.+, विद्यालय ऑडिट (शगुनोत्सव) और राष्ट्रीय उपलब्धि सर्वेक्षण (एन.ए.एस.) जैसे कई नये प्रयास किए हैं, ताकि समग्र शिक्षा के अंतर्गत अधिगम प्रतिफलों में सुधार हेतु, प्रशासनिक शासन के मुद्दों और शैक्षणिक कार्यक्रमो सहित, विद्यालयी शिक्षा की संपूर्ण गुणवत्ता में सुधार लाया जा सके।

 इन पहलों की सफलता प्रभावी कार्यान्वयन, सभी स्तरों पर समन्वय और राष्ट्रीय स्तर से विद्यालय स्तर तक संस्थानों के बीच मज़बूत संबंध पर निर्भर करती है। 

समग्र शिक्षा- विद्यालयी शिक्षा के लिए समेकित योजना

मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने 2018-19 में समग्र शिक्षा का शुभारंभ किया। विद्यालयी शिक्षा के क्षेत्र में यह एक सर्वसमावेशी कार्यक्रम है, जिसका विस्तार विद्यालय-पूर्व से लेकर बारहवीं कक्षा तक है और इसका उद्देश्य है कि विद्यालयी शिक्षा की प्रभावशीलता, जिसे समरूप अधिगम प्रतिफलों एवं विद्यालय प्रवेश के समान अवसरों के रूप में मापा जाता है, का संवर्धन किया जा सके। 

इसमें सर्व शिक्षा अभियान (एस.एस.ए.), राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान (आर.एम.एस.ए.) और शिक्षक शिक्षा (टी.ई.) की तीन पूर्ववर्ती योजनाएं समाहित है। 

परियोजना उद्देश्यों से शिक्षा की गुणवत्ता और व्यवस्था स्तर पर प्रदर्शन में सुधार के लिए विद्यालयी परिणामों के आधार पर यह योजना राज्यों के उत्साहवर्धन जैसे बदलावों को चिह्नित करती है।

इस योजना में 'विद्यालय' की परिकल्पना विद्यालय-पूर्व, प्राथमिक, उच्च प्राथमिक, माध्यमिक से उच्चतर माध्यमिक स्तर तक एक निरंतरता के रूप में की गयी है।

 योजना की दूरदृष्टि में शिक्षा के लिए सतत विकास लक्ष्य (एस.डी.जी.) के अनुसार विद्यालय-पूर्व से उच्चतर माध्यमिक स्तर तक समावेशी और समान गुणवत्ता वाली शिक्षा सुनिश्चित करना है। 

एस.डी.जी. लक्ष्य 4.1 में कहा गया है कि "सुनिश्चित करें कि 2030 तक सभी लड़के और लड़कियां, संगत एवं प्रभावी अधिगम प्रतिफलों की ओर ले जाने वाली निःशुल्क, न्यायसंगत एवं गुणवत्तापूर्ण प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा को पूरा करो" आगे एस.डी.जी. 4.5 में कहा गया है कि "2030 तक, शिक्षा में जेंडर संबंधी विकृतियों को खत्म करें तथा अति संवेदी (वल्नरेबल) लोगों, जिसमें विशेष आवश्यकता समूह और देशज समुदाय के लोगों के साथ ही संवेदनशील परिस्थितियों वाले बच्चे शामिल हैं, के लिए शिक्षा और व्यावसायिक प्रशिक्षण के सभी स्तरों तक समान पहुँच सुनिश्चित करें।"


विद्यालय व्यवस्था : शिक्षकों के कौशल, विविधता की स्वीकार्यता और समाधान

विद्यार्थियों में अंतर की पहचान करने के लिए संवेदनशीलता विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के गुणों और कमजोरियों, योग्यता और रुचि के बारे में जागरूक होना।


 • विद्यार्थियों के बीच सामाजिक-सांस्कृतिक, सामाजिक आर्थिक और भौतिक विविधताओं की स्वीकृति—सामाजिक संरचना, पारंपरिक और सांस्कृतिक प्रथाओं, प्राकृतिक आवास, घर तथा पड़ोस में परिवेश को समझना।

• मतभेदों की सराहना करना और उन्हें संसाधन के रूप में मानना- अधिगम प्रक्रिया में बच्चों के विविध संदर्भ और ज्ञान का उपयोग करना शिक्षण-अधिगम की विभिन्न जरूरतों को समझने के लिए समानुभूति और कार्य- अधिगम शैलियों पर विचार करना और उसी के अनुसार प्रतिक्रिया देना।

 शिक्षार्थियों को विभिन्न विकल्प प्रदान करने के लिए संसाधन जुटाने की क्षमता- आस-पास से कम लागत की सामग्री, कलाकृतियों, अधिगम उपयोगी सहायक स्थानों, मानव संसाधनों और मुद्रित तथा डिजिटल रूप में अनेक संसाधनों को पहचानना एवं व्यवस्थित करना।

• प्रौद्योगिकी के उपयोग से अधिगम सहायता करना- विभिन्न एप्लिकेशन का उपयोग। उदाहरण के लिए गूगल आर्ट एंड कल्चर, गूगल स्काई, गूगल अर्थ, विषय विशिष्ट ऐप्स जियोजेब्रा, ट्रक्स ऑफ़ मैथ और गूगल स्पीका

• अंतर-वैयक्तिक संबंधों मृदु कौशलों से निपटना- सुनने, प्रतिक्रिया देने, बातचीत शुरू करने और बनाए रखने, सकारात्मक संबंध, शारीरिक उपस्थिति और हाव-भाव के कौशल।

जेंडर-संवेदनशील शिक्षा :

हम सभी जानते हैं कि जेंडर सभी विषयों में दखल देने वाला एक सरोकार है और यह ज्ञान के निर्माण के लिए बुनियाद है। जेंडर संवेदनशीलता एक महत्वपूर्ण शैक्षणिक चिंता है जिसे शिक्षकों को अपने शिक्षण-अधिगम की प्रक्रियाओं में समेकित करना चाहिए। 

सुगमकर्ताओं के रूप में सकारात्मक दृष्टिकोण और शैक्षणिक हस्तक्षेप के द्वारा, वे विद्यार्थियों को सामाजीकरण प्रक्रियाओं से मिले जेंडर तथा रूढ़िवादी दृष्टिकोण को सही रूप से समझने एवं अपनाने में मदद कर सकते हैं।

 शिक्षकों को पाठ्यसामग्री और पाठ्यक्रम संबंधी कार्यों में जेंडर पूर्वाग्रह के कारकों की पहचान करने, पुरुष और महिला पात्रों की भूमिका तय करने और पठन सामग्री के संबंध में पूर्वाग्रह की पहचान करने, भाषायी पूर्वाग्रह का पता लगाने तथा राजनीतिक-सामाजिक एवं आर्थिक प्रक्रियाओं सहित सभी क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी को पहचानने की भी आवश्यकता है।

विषयों के अध्यापन में समावेश को बढ़ावा देना-


शीर्षक "मैं, एक शिक्षार्थी के रूप में दिए गए छह कथनों को पढ़ें और उन्हें स्वयं पूरा करें।


मैं, एक शिक्षार्थी के रूप में....


मुझे सीखने में मज़ा आता है, जब---------


मैं जल्दी सीखता हूँ, जब------


पाठ्यपुस्तकों से सीखना। -----------------------  है।


समूहों में सीखना--------------------------------------है।


में किसी और से भली-भाँति सीखता हूँ, जब कोई-----   --------------      -----


मुझे सीखने में मजा आता है, जब-    ----------------


बड़े समूह में प्रत्येक कथन पर अपनी प्रतिक्रियाएँ साझा करें और उन पर विचार-विमर्श करो यह स्पष्ट है कि हम सभी के लिए सफलतापूर्वक सीखने की अपनी प्राथमिकता है।

 उपरोक्त अभ्यास का उपयोग आपकी कक्षा के बच्चों के साथ विद्यार्थियों के रूप में उनके बारे में अधिक जानने के लिए और तदनुसार शिक्षण की योजना बनाने के लिए किया जा सकता है। 

आप बच्चों को मौखिक रूप से वाक्य लिखने या प्रतिक्रिया देने के लिए कह सकते हैं।



भाषाओं के शिक्षण में समावेश:

कुछ बच्चों को भाषा सीखने में विशिष्ट कठिनाइयाँ हो सकती हैं। कठिनाइयों को दूर करने के लिए शिक्षकों को उपयुक्त कार्यनीति अपनाने की आवश्यकता हो सकती है। इनमें, ये कार्यनीतियाँ शामिल हो सकती हैं।

 • सभी बच्चों को लाभान्वित करने वाली वास्तविक जीवन स्थितियों से संबंधित सामग्री को शामिल करना। 

• जहाँ किसी भी क्षेत्र में एक से अधिक भाषाओं का उपयोग किया जाता है, वहाँ

अधिकांश लोगों द्वारा बोली जाने वाली अथवा पसंदीदा भाषा का उपयोग। सभी बच्चों में सांकेतिक भाषा (साइन लैंग्वेज) और ब्रेल-लिपि के बारे में जागरूकता और संवेदनशीलता पैदा करना। .

बोली जाने वाली भाषा का उपयोग करने में आने वाली कठिनाइयों की भरपाई के लिए वैकल्पिक संचार प्रणाली।

लेखन में कठिनाइयों का सामना करने वाले बच्चों के लिए आई.सी.टी. का उपयोग करना।

• कुछ बच्चों को लिखित जानकारी को समझने के लिए सहायता की आवश्यकता हो सकती है।

• दृश्य सामग्री से सीखने और लंबे अनुच्छेदों के लिए व्यक्तिगत ध्यान तथा अधिक समय दें। ब्रेल-पठन सामग्री को पढ़ने का अर्थ है वाक्यांशों, वाक्यों आदि को संश्लेषित कर

पूर्णता में याद रखना। यही कारण है कि ब्रेल पाठ को पढ़ने के दौरान दृष्टिबाधित बच्चों को अधिक समय की आवश्यकता होती है।

• श्रवणबाधित बच्चों के साथ काम करने वाले शिक्षकों और अन्य लोगों के लिए ज़रूरी है कि वह नयी शब्दावली को समझने, शब्दों के बीच भेदभाव करने और कई अर्थों वाले शब्दों को समझने में आवश्यकतानुसार सहायता प्रदान करें।

• वाक्यों की रचना में व्याकरण और शब्दों का सही उपयोग करना शामिल है, जो कुछ बच्चों के लिए मुश्किल हो सकता है। व्याकरण (भूत काल, अव्यय, कर्तृवाच्य और कर्मवाच्य आदि) का उपयोग करने में भी शायद उन्हें चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।

 शिक्षकों को वाक्य निर्माण, विचारों और अवधारणाओं के बीच संबंध बनाने, विचारों को समझने तथा वाक्यांशों के उपयोग पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है।

• संज्ञानात्मक दुर्बलता वाले बच्चों के साथ काम करने वाले शिक्षकों और अन्य लोगों के लिए आवश्यक है कि वे मौखिक भाषा (सुनना, विचारों की अभिव्यक्ति और बोलना), मुखरता (धाराप्रवाह और सुसंगत रूप से बोलने की क्षमता) और पढ़ने (डिकोडिंग ध्वन्यात्मक ज्ञान और शब्द पहचानने) में उनकी सहायता प्रदान करें।

 विद्यार्थी कुछ शब्दों को छोड़ सकता है, उनका स्थान भुला सकता है, एक शब्द की बजाय दूसरा उपयोग कर सकता है और आलंकारिक भाषा, जैसे— मुहावरे, रूपक, उपमा इत्यादि को समझने में कठिनाई का अनुभव कर सकता है।


• बच्चों को कक्षा में भाषा बोध (नयी शब्दावली, वाक्य संरचना, विभिन्न अर्थों और अवधारणाओं वाले शब्दों) या समझने या लिखने में कठिनाई हो सकती है; विशेष रूप से तब, जब कक्षा में तेज़ी से प्रस्तुति की जाती है। 

शिक्षकों को यह भी याद रखने की आवश्यकता है कि कुछ बच्चों को विचारों को व्यवस्थित करने, पाठ याद करने व दोहराने, शब्दों का उच्चारण करने या एक कहानी का क्रम ज्ञात करने और आँखों के तालमेल वाली गतिविधियों तथा लेखन (अस्पष्ट लिखावट, वर्तनी की लगातार गलतियाँ) करते समय कठिनाई का सामना करना पड़ सकता है।


गणित के शिक्षण में समावेश :

कुछ विद्यार्थियों की संबंधित कठिनाइयों को करने के लिए आवश्यक है कि भाषा को दूर सरल बनाया जाए। स्पर्शनीय सामग्री, ज्यामिति के लिए सहायक शिक्षण सामग्री और प्रश्नों को हल करते समय संगणक उपलब्ध कराया जाए।

 बच्चों को ग्राफ़, सारणी या बार चार्ट में आंकड़ों की व्याख्या करने में भी मदद की आवश्यकता हो सकती है। ऐसे विद्यार्थी हो सकते हैं जिन्हें दिशाओं की मौखिक व्याख्या करने या मानसिक गणना करते समय मदद की आवश्यकता हो।

 आई.सी.टी. का उपयोग मात्रात्मक और अमूर्त अवधारणाओं के साथ कठिनाइयों को दूर करने में मदद कर सकता है। दृष्टिबाधित बच्चों के साथ काम करने वाले शिक्षकों और अन्य लोगों को उन्हें स्थानिक

अवधारणाओं को विकसित करने और स्थानिक अवधारणाओं के बीच संबंधों को समझने, त्रि-आयामी वस्तुओं के दो-आयामी स्वरूप को समझने और गणित संबंधी विशेष अक्षरों (प्रतीकों) को समझने के लिए सहायता प्रदान करने की आवश्यकता है। 

इन बच्चों को गणितीय पाठ की ऑडियो रिकॉर्डिंग (उदाहरण के लिए, समीकरण) की व्याख्या करने में कठिनाई का सामना करना पड़ सकता है। 

इन्हें स्थानिक व्यवस्था, रंग कोड और नेमेथ (Nemeth) या किसी अन्य गणितीय ब्रेल कोड को समझने में अथवा गणितीय पाठ को लिखने और पढ़ने में कठिनाई हो सकती है।

• श्रवणबाधित बच्चों के साथ काम करने वाले शिक्षकों और अन्य लोगों को बच्चों के लिए सहायता प्रदान करने की आवश्यकता है- भाषायी विकास में देरी के कारण, जिससे सामान्य शब्दावली और गणित की तकनीकी शब्दावली (पारस्परिक, रैखिक जैसे शब्दों) की कमी हो सकती है, गणितीय समस्याओं के अर्थ को समझाने के लिए अत्यधिक शब्दों और बहुअर्थों वाले विभिन्न शब्दों का प्रयोग, जैसे-ब्याज, सारणी, क्रेडिट, दर, आयतन, ऊर्जा, बिंदु, कोण इत्यादि।

 होठों/स्पीच रीडिंग के दौरान विद्यार्थी को शायद कुछ गणित के शब्दों, से— दसवीं और दसवीं, साठ और आठ आदि में भेद करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। 

संज्ञानात्मक कार्यनीतियों के उपयोग से सार्थक जानकारी का चयन करने और समस्याओं को हल करने के लिए आवश्यक नियमों को लागू करने संबंधी सीमाओं के कारण भी समस्यायों का सामना करना पड़ सकता है। 

• संज्ञानात्मक हानि वाले बच्चों को अनुक्रमण, समस्या को चरणबद्ध हल करने और स्थानीय मान में कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।

 गणितीय गणना, संख्या में परिवर्तन, समस्याओं की प्रतिलिपि बनाना और परिचालन प्रतीकों में भ्रम, जैसे कि x की जगह + और संचालन के अनुक्रमों को याद रखने में कठिनाई भी स्पष्ट है।

 बीजगणित और पूर्णांकों आदि में अमूर्त अवधारणाओं को समझने और ज्यामिति में विभिन्न आकृतियों की पहचान, दिशात्मकता और शब्द समस्याओं को समझने में भी बच्चों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।


ईवीएस और विज्ञान के शिक्षण में समावेश:

• अंदर एवं बाहर की जाने वाली गतिविधियों में कुछ विद्यार्थियों को गतिशीलता और प्रयोगोचित हेर-फेर कुशलताओं में सहायता की आवश्यकता हो सकती है।

 विद्यार्थियों को अनुकूलित या वैकल्पिक गतिविधियों, अनुकूलित उपकरण, आई.सी.टी. का उपयोग, वयस्क या साथियों की सहायता, अतिरिक्त समय और उन पाठों में सहायता से लाभ हो सकता है जो उनके लिए आसानी से सुलभ नहीं हो सकते हैं।

 • कम दृष्टि वाले या दृष्टिहीन बच्चों के साथ काम करने वाले शिक्षकों और अन्य लोगों को चाक बोर्ड पर किए गए कार्यों, प्रदर्शनों, प्रस्तुतियों, ग्राफ़िक्स और आरेखों, प्रयोगों, भौतिक सुरक्षा, सार और कठिन अवधारणाओं को समझने के लिए सहायता की आवश्यकता हो सकती है। इस सब के लिए अधिक समय की आवश्यकता भी हो सकती है।

 श्रवणबाधित बच्चों को अमूर्त शब्दों और अमूर्त अवधारणाओं के बीच संबंध को समझने के लिए सहयोग की आवश्यकता हो सकती है।

 प्रकाश संश्लेषण, अधिवास (habitat) और सूक्ष्मजीव जैसी वैज्ञानिक अवधारणाओं को दृश्य सहायक सामग्री के बिना समझने में कठिनाई हो सकती हैं।

 एक से अधिक आयामों/चरणों वाली समस्याओं को हल करना, उदाहरण के लिए कई आयामों, जैसे- संख्या, आकार और रंग के आधार पर वस्तुओं की तुलना, अपेक्षाकृत रूप से केवल आकार के आधार पर वस्तुओं की तुलना करने से जटिल है।

• संज्ञानात्मक दुर्बलता वाले बच्चों की समुचित समझ हेतु, विज्ञान की तकनीकी भाषा समझाने और अवधारणाओं (उदाहरण के लिए, दबाव और बल) के बीच सार्थक संबंध/संबंधों को उजागर करने के लिए उचित योजना बनाने की आवश्यकता है।

 अमूर्त अवधारणाओं को समझने, योजना बनाने, आयोजन, अनुक्रमण और सामान्यीकरण के लिए सहायता की आवश्यकता होती है। विज्ञान के प्रयोगों का संचालन करते समय साथियों द्वारा दी गई सहायता काफी लाभदायक है।


सामाजिक विज्ञान के शिक्षण में समावेश:

ईवीएस और सामाजिक विज्ञान में सीखने के प्रतिफलों को प्राप्त करने के लिए कुछ विद्यार्थियों को सहायक सामग्रियों एवं अतिरिक्त सहायता की आवश्यकता हो सकती है पाठ्यपुस्तकों की सुलभता हेतु बोलने वाली पुस्तकें/डी.ए.आई.एस.वाई. (डेज़ी) पुस्तकें; वैकल्पिक संचार विधियों, जैसे आई.सी.टी.या डिजिटल सहायता से बोलकर अपने विचारों को संप्रेषित करने के लिए लेखन में मदद; सामग्री और गतिविधियों का अनुकूलन; दिखाई देने वाली जानकारी का प्रबंधन करने के लिए शिक्षा की सहायक वस्तुएँ या विभिन्न भौगोलिक अवधारणाओं, विशेषताओं और पर्यावरण को समझने के लिए सहायता। 

समूह गतिविधियों, जैसे सहयोगी अधिगम द्वारा परियोजना एवं प्रदत्त कार्य (असाइनमेंट) करने से सभी विद्यार्थी कक्षा की सभी गतिविधियों में सक्रिय रूप से भाग लेने में सक्षम बनेंगे। स्पर्श योग्य आरेख/नक्शे, बोलती किताबें, ऑडियो-विजुअल और ब्रेल सामग्री आदि जैसे संसाधनों का उपयोग किया जा सकता है।

• शिक्षकों को भौगोलिक शब्दावली और अवधारणाओं की व्याख्या करते हुए, दृष्टिबाधित बच्चों के लिए सावधानीपूर्वक योजना बनाने की आवश्यकता है।

 उदाहरण के लिए अक्षांश, देशांतर, दिशा-निर्देश और ग्राफ़िक, दृश्य चित्रण जैसे ग्राफ़िक और स्मारकों की वास्तु संरचना का अध्ययन करते समय दृश्य विवरण प्रदान करना, नक्शा, चित्र, शिलालेख और प्रतीक के बारे में बताना।

• इन बच्चों को पर्यावरण और अंतरिक्ष का अवलोकन करने के लिए भी सहायता की आवश्यकता होती है- भूमि, जलवायु, वनस्पति और वन्य जीवन, संसाधनों और सेवाओं का विवरण अध्ययन सामग्री, जैसे-प्रश्न वर्तनी सूची, महत्वपूर्ण संदर्भ, प्रश्नोत्तर और विद्यार्थियों के लिए उपयोगी अन्य जानकारी को स्पर्शक/उभरे प्रारूप या उचित रंग विरोधाभास के साथ पुनः बनाई अथवा बड़े अक्षरों में प्रदान की जा सकती हैं।

• श्रवणबाधित बच्चों को शब्दावली/तकनीकी शब्दों, अमूर्त अवधारणाओं, तथ्यों, तुलनाओं, प्रभाव संबंधों और घटनाओं के कालक्रम आदि की समझ के लिए सहायता की आवश्यकता होती है। 

इससे उन्हें इतिहास और नागरिक शास्त्र में भारी भरकम पाठ (पाठ्यपुस्तक स्रोत सामग्री) का अध्ययन करते समय पढ़ने में मदद मिलती है और वे निष्कर्ष निकाल पाते हैं।

संज्ञानात्मक प्रसंस्करण की समस्या रखने वाले कुछ बच्चों के लिए चित्र, चार्ट, ग्राफ़ और नक्शे को समझना मुश्किल हो सकता है। पढ़ने की कठिनाइयों वाले विद्यार्थियों के लिए लंबे पाठ से सार्थक जानकारी निकालना एक चुनौती हो सकती है।

 इसके अलावा शिक्षक को यह ध्यान रखना चाहिए कि घटनाओं के अनुक्रम को याद रखना और उन्हें आपस में जोड़ना, सर्वमान्यीकरण करना तथा पाठ्यपुस्तकों में दी गई जानकारी को मौजूदा परिवेश के साथ जोड़ना भी कभी-कभी समस्याओं का कारण बन सकता है। 

कुछ बच्चों में अमूर्त अवधारणाओं को समझने और उनकी व्याख्या करने की सीमित क्षमता हो सकती है।



समावेशी वातावरण में मूल्यांकन:

पिछले खंड में विविध शिक्षण आवश्यकताओं वाले बच्चों के लिए समावेशी कक्षा निर्माण में आपकी मदद हेतु कुछ विचार एवं उदाहरण प्रस्तुत किए गए। 

इस खंड में समावेशी व्यवस्था में मूल्यांकन को लागू करने के लिए कुछ सुझाव प्रस्तुत किए गए हैं और ये आपको समावेशी मूल्यांकन में संलग्न होने के नये तरीके विकसित करने के लिए प्रेरित करेंगे। अपने शिक्षण की योजना बनाते समय यह याद रखना अच्छा है कि मूल्यांकन तो पूरे पाठ-शिक्षण के दौरान होता है। 

यह आपको विषय के शिक्षण में निम्नलिखित चरणों को पहचानने और योजना बनाने की अनुमति देता है। अपने पाठ-शिक्षण के अंत में किए मूल्यांकन से यह समझने में मदद मिलती है कि शिक्षण उद्देश्यों की कितनी प्राप्ति हो पाई है।

• एक मिश्रित क्षमता समूह में एक प्रश्न के लिए विभिन्न प्रतिक्रियाओं को प्रोत्साहित करें और स्पष्ट संदेश दें। एक प्रश्न पूछने के बाद पर्याप्त समय के लिए ठह।

 हमें याद रखना चाहिए कि सामग्री को समझाने के लिए की गई गतिविधियाँ फिर से मूल्यांकन के लिए इस्तेमाल की जा सकती हैं। 

• उत्तर देने में लचीलापन अपनाएं। उदाहरण के लिए, याद करने के बजाय देखकर अथवा पहचानकर चुनने, सही उत्तर को रंग करने, काटने और चिपकाने, मिलान करने, विषम चीज़ को इंगित करने आदि के लिए कहें। मसलन-


• श्रवण प्रसंस्करण की आवश्यकता वाले उत्तरों के लिए एकाक्षर (मोनोसिलेबल्स) में प्रतिक्रियाओं को स्वीकार करें। • पाठ्यपुस्तक के अभ्यासों में वर्णमाला की गतिविधियों की ट्रेसिंग की जगह अक्षर के कट-आउट का उपयोग करें, जिससे विद्यार्थी को वर्णमाला के उतार-चढ़ाव और आकार को अधिक बारीकी से जानने में मदद मिलती है।


बोलने संबंधित देरी वाले विद्यार्थियों को अपने अधिगम का प्रदर्शन वैकल्पिक रूप से चित्रों या टिकटों के उपयोग, सीखे हुए को चित्र में, इशारा करके प्रदर्शित करने की अनुमति दें।

• केवल मौखिक या लिखित प्रति उत्तर के बजाय प्रति-उत्तर प्राप्त करने के लिए फ्लैश कार्ड, शब्द कार्ड (उदाहरण के लिए, शब्दों को पेश करने या व्याकरणिक रूप से सही वाक्य का निर्माण करने के लिए), चित्रों और वास्तविक वस्तुओं का उपयोग करें।

 उदाहरण के लिए जब आप किसी जानवर का नाम कहते हैं तो बच्चे को फ्लैश कार्ड लेने के लिए कहें। वास्तविक वस्तुओं की मदद से उत्तर या मिलान की जाँच जैसी गतिविधियां की जा सकती हैं।


निष्कर्ष:

यह मॉड्यूल, विद्यालयों को समावेशी बनाने के काम में लगे हुए शिक्षकों और अन्य सभी हितधारकों की, अपने कार्य हेतु उस आवश्यक ज्ञान, दृष्टिकोण और कौशल प्राप्ति में मदद करेगा, जो विभिन्न समूहों के विद्यार्थियों के साथ प्रभावी ढंग से काम करने के लिए जरूरी है। 

यह सामग्री पाठकों को राष्ट्रीय नीतियों, पाठ्यचर्या की रूपरेखा, विशेष रूप से एन.सी.एफ. 2005, सीखने के प्रतिफलों और उन्हें प्राप्त करने के लिए उपयुक्त तकनीकों के बारे में नजदीकी से जानने में मदद करेगी। 

यह शिक्षकों को इन बातों में सक्षम बनाने में मददगार होगा— समावेशी कार्यनीतियों का उपयोग करने और प्रत्येक बच्चे को समूह के सदस्य के रूप में स्वीकार करने, सभी विद्यार्थियों की ज़रूरतों के लिए कक्षा को भौतिक और व्यावहारिक रूप से पुनर्गठित करने तथा गतिविधियों की योजना इस तरह से बनाने ताकि कक्षा में सभी विद्यार्थियों की भागीदारी सुनिश्चित हो और दूसरा विद्यालय में, विद्यार्थियों की विविधता को संबोधित करने हेतु व्यवहार हो।


स्व-मूल्यांकन:

. पाठ पढ़ाते समय विविध आवश्यकता वाले विद्यार्थियों की सहायता करने के लिए आप अपने शिक्षण विषय में जो भी परिवर्तन करेंगे, उन्हें सारांशित करें।


आपके विचार में जो सबसे महत्वपूर्ण है, उससे शुरू करते हुए इनकी प्राथमिकता


1.


2.


3.


शिक्षक के रूप में, उस समर्थन और मार्गदर्शन को पहचानें जो इन परिवर्तनों को करने में आपकी


मदद करेगा। ये बदलाव सभी बच्चों के लिए कैसे फायदेमंद हो सकते हैं? अपने विद्यालय में अन्य सहयोगियों के साथ अपने उत्तरों की तुलना करें और अपनी सूची में नये विचार जोड़ें। • मैं सभी बच्चों के लिए मूल्यांकन को कैसे सार्थक और समावेशी बनाऊँगा? अपनी सूची की तुलना अपने साथी से करें।




एन.सी.एफ. 2005 के अनुसार, मूल्यांकन का उद्देश्य नहीं है: 

बच्चों को भय के वातावरण में पढ़ने के लिए मजबूर करना। 'धीमा सीखने वाले विद्यार्थियों' या अव्वल आने वाले विद्यार्थियों' या 'समस्या वाले बच्चों के रूप में विद्यार्थियों को पहचानना या लेबल करना। ऐसी श्रेणियाँ बच्चों में अलगाव पैदा करती हैं और सीखने का दायित्व पूर्णतया बच्चों पर डालकर, उन्हें शिक्षा शास्त्र की भूमिका और उद्देश्य से अलग कर देती हैं।




समावेशी शिक्षा और आर.पी.डब्ल्यू.डी. अधिनियम, 2016


हाल ही में पारित आर.पी.डब्ल्यू.डी. अधिनियम, 2016 जिसे हिंदी में दिव्यांगजन अधिकार कानून, 2016 के रूप में भी जाना जाता है, समावेशी शिक्षा को परिभाषित करता है और इसे बढ़ावा देता है-

समावेशी शिक्षा का अर्थ, शिक्षा की एक ऐसी प्रणाली से है जिसमें सामान्य और विशेष आवश्यकता वाले विद्यार्थी एक साथ सीखते हैं और शिक्षण-अधिगम व्यवस्था को विशेष आवश्यकता वाले विद्यार्थियों की विभिन्न प्रकार की शिक्षण अधिगम की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए उपयुक्त रूप से अनुकूलित किया जाता है। (आर.पी.डब्ल्यू.डी. अधिनियम, 2016 का अनुच्छेद 1 एम)




UP Teachers Good News : शिक्षकों की नौकरी पहले से अधिक सुरक्षित, शिक्षक सेवा संबंधी नियमावली में आवश्यक बदलाव

उत्तर प्रदेश में शिक्षकों की नौकरी पहले से अधिक सुरक्षित हो गई है। शिक्षक सेवा संबंधी नियमावली में आवश्यक बदलाव किए जाने हैं, जिसे दो माह के...